July 16, 2024 : 2:17 AM
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रूस-यूक्रेन युद्ध के तीस दिन पूरे, लोगों के दर्द और तकलीफ़ की आंखों देखी

मैं ये सब एक ऐसे शहर में बैठकर लिखकर रही हूं जहां बमबारी नहीं हो रही है. रूसी मिसाइलें घरों से नहीं टकरा रही हैं. हवाई हमलों की चेतावनियों के साथ बेहाल करने वाली विलाप की आवाज़ें नहीं आ रही हैं.

मैं सोचती हूं कि काश, यूक्रेन वाले भी ये कह पाते. एक महीने तक यूक्रेन से रिपोर्टिंग करने के बाद मैं उनके देश को एक बर्बर हमले के बीच छोड़ आई हूं और मुझे नहीं पता कि ये सब कब ख़त्म होगा.

ऐसा नहीं है कि मुझे ये नहीं पता था कि व्लादिमीर पुतिन क्या करने में सक्षम हैं.

मैंने 2014 में क्राइमिया पर क़ब्ज़े के दौरान रिपोर्टिंग की है. इसके बाद रूस की छद्म ताक़तों और दुष्प्रचार की मार झेलने वाले पूर्वी यूक्रेन में हुए युद्ध पर रिपोर्टिंग की है.मैंने कई सालों तक रूस से रिपोर्टिंग की है और इस दौरान विपक्षी दलों के नेताओं की हत्याओं और उन्हें ज़हर दिए जाने की घटनाओं पर ख़बरें लिखी हैं. चेचन्या और जॉर्जिया में हुए युद्ध एवं बेसलान स्कूल की घेराबंदी जैसी भयानक घटनाओं पर भी ख़बरें लिखी हैं.

लेकिन हाल ही में मुझे ‘सुरक्षा के लिए ख़तरा’ बताकर रूस से बाहर निकाल दिया गया.

जब मैं कीएव पहुंची…

इसके बाद भी मैं पिछले महीने यूक्रेन की राजधानी कीएव पहुंची. मैं आश्वस्त थी कि रूसी राष्ट्रपति यूक्रेन पर हमला नहीं करेंगे. ये बात अपने आप में बड़ी बेतुकी, तर्कहीन और भयानक लगी और दोनों देशों में मैंने जिससे भी इस बारे में बात की, वह इस बात पर सहमत था.

लेकिन 24 फ़रवरी को मैं एक धमाके की आवाज़ के साथ जगी जिसने हम सभी को ग़लत साबित कर दिया.

जब युद्ध शुरू हुआ तो 15 वर्षीय नीका काफ़ी डरी हुई थी. अपने पियानो के पास बैठी नीका ने बेहद तेज़ गति के साथ पियानो बजाना शुरू किया ताकि काफ़ी तेज़ आवाज़ हो. उसने पूरी ताक़त से चिल्लाना भी शुरू कर दिया. लेकिन पियानो और नीका की तेज़ आवाज़ के बावजूद बमबारी की आवाज़ें मद्धम नहीं हुईं.

नीका यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीएव की रहने वाली हैं. लेकिन उनसे मेरी मुलाक़ात एक छोटे से होटल में हुई जहां तमाम भागे हुए परिवार घुप्प अंधेरे में शरण लिए हुए थे. ये लोग डरे हुए थे कि कहीं रूस के लड़ाकू विमानों की नज़र उन पर न पड़ जाए.जब हम इस होटल में पहुंचे तो यहां की रिसेप्शनिस्ट ने हमसे कहा कि हम तुरंत कैंटीन में खाना खा लें क्योंकि उन्हें कर्फ़्यू लगने से पहले घर पहुंचना है और रात में निकलने वालों को गोलीबारी का शिकार होने का ख़तरा था.

कोई लाइट न जलाएं

रिशेप्सनिस्ट ने हमसे कहा, “कोई लाइट न जलाएं और गर्म पानी ज़्यादा इस्तेमाल न करें.” जब हमने पूछा कि नज़दीकी बम शेल्टर कहां है तो उसने किचन के पीछे की ओर इशारा किया.

नीका वहां कुछ रातों से मौजूद थी लेकिन उसके लिए सोना मुश्किल था. नीका ने बताया कि हर सुबह उसका पहला ख़्याल ये होता है कि “भगवान का शुक्र है कि मैं ज़िंदा हूं.”

उसने अंग्रेज़ी में बात की और इतने सीधे सपाट ढंग से बात की कि सुनने वाला निरुत्तर हो जाए.

नीका ने युद्ध का पहला हफ़्ता अपने एक रिश्तेदार के घर में तहख़ाने में बिताया था. ये अनुभव साझा करते हुए उसने कहा, “हम लोग घबराए हुए थे क्योंकि हमारी ज़िंदगी पर ख़तरा मंडरा रहा था और हमें छिपना था.

ये जगह काफ़ी ठंडी और छोटी थी. हमारे पास खाने का ज़्यादा सामान नहीं था. ये काफ़ी त्रासदी भरा समय था. अब मैं हर आवाज़ से डरती हूं. अगर कोई ताली भी बजाता है तो मुझे लगता है कि मैं रो दूंगी. मैं कांपने लगती हूं.”

टॉर्च की रोशनी में नीका अपने फ़ोन पर युद्ध से पहले की ज़िंदगी की तस्वीरें देख रही थीं. इन तस्वीरों में वह मुस्कराती हुई, अपने दोस्तों के साथ, पार्क में या अपने घर में नज़र आती हैं.

नीका कहती हैं, “हम बस पुराने दिनों में लौटना चाहते हैं. हम इस बात को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं कि हमारे परिवार कल भी ज़िंदा रहेंगे. हम शांति चाहते हैं.”

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