July 16, 2024 : 1:41 AM
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क्या हिंदुओं को देश के कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सकता है?

जिन राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम है वहां की सरकारें उन्हें अल्पसंख्यक घोषित कर सकती हैं’. 

ये जानकारी केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दाख़िल कर दी है. जिसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि हिंदू बहुल भारत में क्या हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सकता है? अगर राज्य सरकारें हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देती हैं तो उसका आधार क्या होगा और इससे हिंदुओं को क्या फायदा होगा ?

ये हलफनामा केंद्र सरकार ने बीजेपी नेता और एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका के बाद दायर किया है. याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग की वैधता को चुनौती दी है.

बीबीसी से बातचीत में अश्विनी कुमार उपाध्याय ने बताया, ”2002 में सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की बेंच ने कह दिया था कि राष्ट्रीय स्तर पर भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जा सकता. दोनों की पहचान राज्य स्तर पर की जाएगी. लेकिन अभी तक राज्य स्तर पर गाइडलाइन क्यों तैयार नहीं की गई है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान की जा सके”.

अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर 6 धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है. इसमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म शामिल है. केंद्र सरकार ने जैन धर्म को 2014 में और अन्य को 1993 में अल्पसंख्यक का दर्जा दिया था.

बीजेपी नेता और एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि अल्पसंख्यक को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है. बिना किसी आधार के अपनी मर्जी से सरकार ने अलग अलग धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया हुआ है. देश में यहूदी और बहाई धर्म के लोग भी हैं लेकिन उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिला हुआ है.

इसी याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि जैसे महाराष्ट्र ने 2016 में यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था वैसे ही राज्य, धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं. कर्नाटक ने भी उर्दू, तेलुगू, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमानी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती को अपने राज्य में अल्पसंख्यक भाषाओं का दर्जा दिया है.

गौर करने वाली बात ये है कि केंद्र सरकार ने कहा है कि सिर्फ राज्यों को अल्पसंख्यकों के विषय पर कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता. इसका मतलब है कि राज्य चाहें तो ऐसा कर सकते हैं लेकिन केंद्र अपने स्तर पर अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर अधिसूचना जारी कर सकता है.

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