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16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाली एक बस ड्राइवर की बेटी ने 56 साल पहले खोजा था पहला ह्यूमन कोरोनावायरस

  • जब जून ने वायरस के खोज की सीनियर को दी तो उन्होंने इसकी तस्वीर को खराब बताते हुए नकारा दिया था
  • पैसों की कमी के कारण 16 साल की उम्र में पढ़ाई छूटी तो बतौर लैब टेक्नीशियन काम करना शुरू किया

दैनिक भास्कर

Apr 21, 2020, 09:50 AM IST

नई दिल्ली. दुनियाभर में भले ही अब तक नए कोरोनावायरस की वैक्सीन न तैयार हो पाई हो लेकिन इंसानको संक्रमित करने वाले पहले कोरोनावायरस के खोज की कहानी दिलचस्प है। इसे 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाली एक बस ड्राइवर की बेटी जून अल्मेडा ने 1964 में खोजा था। सर्दी-खांसी से जूझ रहे मरीजों के नाक के सैम्पल को जून ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी में देखा तो एक ताजनुमा (क्राउन) वायरस दिखा। जब इस बात की जानकारी जर्नल और सीनियर को दी तो उन्होंने यह कहते हुए रिसर्च रिजेक्ट कर दी कि इसकी तस्वीर काफी खराब है लेकिन बाद में यह खोज इतिहास बनी। कोरोनावायरस एक क्रॉउन की तरह दिखता है इसके आधार पर ही इसका नाम कोरोना रखा गया। 

ऐसा दिखा था कोरोनावायरस

बतौर लैब टेक्नीशियन शुरू किया था करियर
स्क्रॉटलैंड की अल्मेडा एक वायरस विशेषज्ञ थीं। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1930 में ग्लासगो में हुआ था। पिता एक बस ड्राइवर थे और आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाए तो अमलेडा को 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अल्मेडा ने ग्लासगो रॉयल इन्फर्मरी की एक लैब में बतौर टेक्नीशियन के तौर पर काम करना शुरू किया। कुछ महीनों के बाद ज्यादा वह लंदन आईं और सेंट बार्थोलोमियूज हॉस्पिटल में बतौर लैब टेक्नीशियन काम करने लगीं। 1954 में वैनेजुएला के एक आर्टिस्ट एनरीक अल्मेडा से शादी के बाद वह कनाडा आ गईं। टोरंटो के ऑन्टेरियो कैंसर इंस्टीट्यूट में उन्होंने बतौर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियन काम करना शुरू किया। 

लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल ने नौकरी का ऑफर दिया

अल्मेडा का मन नई चीजों की रिसर्च में अधिक लगता था। यही वजह थी कि बिना किसी डिग्री के उन्होंने एक अलग मुकाम बनाया। कनाडा के बाद ब्रिटेन में उनके काम की अहमियत को समझा गया। 1964 में लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल ने उन्हें नौकरी का ऑफर दिया।

जर्नल ऑफ जनरल वायरोलॉजी में प्रकाशित हुई थी खोज

अल्मेडा और उनके सीनियर डॉ. टायरेल ने बाद में वायरस को नाम दिया था कोरोना क्योंकि इसके चारों ओर एक क्राउन यानी ताजनुमा संचरना थी। शुरुआती दौर में यह रिसर्च खारिज होने के बाद 1965 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में इसकी जानकारी दी गई। इसकी खोज के समय कहा गया था कि ये वायरस इनफ्लूएंजा की तरह दिखता तो है, पर ये वो नहीं, उससे कुछ अलग है।

दो साल इस खोज को जर्नल ऑफ जनरल वायरोलाजी में प्रकाशित किया गया। 

एचआईवी की पहली हाई क्वालिटी इमेज बनाने में मदद की
अल्मेडा के नाम कई उपलब्धियां रही हैं। उन्होंने एड्स के वायरस एचआईवी की पहली हाई-क्वालिटी इमेज बनाने में मदद की थी। हेपेटाइटिस वायरस के दो अलग-अलग हिस्से होते हैं, यह बात भी अल्मेडा ने दुनिया के सामने पहली बार रखी। हेपेटाइटिस की वैक्सीन तैयार करने में यह रिसर्च काफी मददगार साबित हुई थी। 

1985 में योगा टीचर बनीं, 2007 में दुनिया से रुख्सत हुईं
विज्ञान के क्षेत्र में अल्मेडा लम्बे समय तक एक्टिव रहीं। 1985 में योग टीचर बनीं और रिटायर्ड वायरोलॉजिस्ट फिलिप गार्डनर से शादी की। 2007 में 77 साल की उम्र में इनका निधन हुआ। 

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