July 16, 2024 : 2:28 AM
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स्मृति इरानी को करना पड़ा हार का सामना

स्मृति इरानी

मोदी सरकार की मंत्री स्मृति इरानी और अमेठी की निवर्तमान सांसद यहां से चुनाव हार गई हैं 

कांग्रेस के किशोरी लाल ने स्मृति इरानी को एक लाख 67 हज़ार 196 मतों के बड़े अंतर से हराया है.

जिस अमेठी सीट पर पिछले लोकसभा चुनावों में उनके सिर गांधी परिवार का किला भेदने का सेहरा बंधा था, आज उसी अमेठी में वे गांधी परिवार के एक क्षेत्र प्रतिनिधि से पिछड़ गईं.

इस बार के लोकसभा चुनावों में अमेठी देश की उन हॉट सीटों में से थी, जिस पर बहुत से लोगों की निगाहें टिकी थीं.

अमेठी के निर्णायक रुझानों पर स्मृति इरानी ने बीजेपी नेताओं, कार्यकर्ताओं का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, “आज नरेंद्र मोदी, योगी जी का आभार व्यक्त करती हूं. 30 वर्षों के काम को पांच साल में पूरा किया. जो जीते हैं, उनको बधाई. मैं आशा करती हूं कि हमने जितनी निष्ठा के साथ गांव-गांव जाकर सेवा की, उसी तरह सेवा होती रहेगी. संगठन को और सशक्त करेंगे. जैसा अटल जी कहते थे- क्‍या हार में क्‍या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही.”

अमेठी में एक जगह लगी आग बुझाने के लिए कार्यकर्ताओं को निर्देश देते, ख़ुद नल चलाते और अवधीभाषी बुज़ुर्ग महिलाओं को ढांढ़स बंधाते हुए उन्हें राष्ट्रीय चैनलों पर देखा गया.

तब यह तो माना जा रहा था कि स्मृति 2014 के मुक़ाबले मज़बूत नज़र आ रही थीं लेकिन वे राहुल गांधी को पटखनी ही दे देंगी, यह आकलन बहुत कम लोगों ने किया था.

अपने दूसरे प्रयास में स्मृति इरानी यह सीट गांधी परिवार से छीनने में कामयाब रही. राहुल गांधी के ख़िलाफ़ उनकी जीत का अंतर 55 हज़ार से अधिक था.

वाक कौशल का इस्तेमाल

स्मृति इरानी

भाजपा की राजनीति के पुराने जानकार बताते हैं कि स्मृति इरानी को राजनीति में लाने के पीछे प्रमोद महाजन थे लेकिन 2006 में उनकी हत्या के बाद स्मृति के राजनीतिक सफ़र की रफ़्तार भी घटी.

कुछ समय तक उन्होंने पार्टी के भीतर चुपचाप काम किया, साथ ही अपने वाक कौशल के इस्तेमाल से पहचान भी बनाती रहीं.

इसके बाद इरानी को महाराष्ट्र भाजपा का महिला मोर्चा अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया. 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्हें टिकट नहीं मिला लेकिन तीन-चार भाषाओं पर अपनी पकड़ के इस्तेमाल से उन्होंने देश भर में पार्टी का प्रचार किया.

2010 में जब नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो स्मृति को पार्टी के राष्ट्रीय महिला मोर्चे की कमान दे दी गई.

अगले ही साल वह गुजरात से राज्यसभा सांसद चुनी गईं और फिर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने लगीं. यही वह दौर था जब वह खुले तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने लगीं.

कई जानकार यह भी मानते हैं कि पार्टी में क़द बढ़ने के साथ उन्हें कुछ स्तरों पर लिंगभेद का सामना भी करना पड़ा. उन्हें वाक कौशल का फ़ायदा मिला और वह राष्ट्रीय प्रवक्ता बना गईं. टीवी चैनलों पर पक्ष रहते हुए वह भाजपा का एक चर्चित चेहरा बन गईं ।

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