जयप्रकाश नारायण ने 14 अक्तूबर, 1920 को प्रभावती से विवाह किया था. उस समय प्रभावती की उम्र मात्र 14 साल थी. वो ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी थीं और उस समय भी पुरुषों की तरह कुर्ता और पायजामा पहना करती थीं.
जेपी उस समय पटना के साइंस कालेज में विज्ञान के विद्यार्थी थे और एक छात्र नेता के रूप में भी उभर रहे थे. प्रभावती महात्मा गाँधी से काफी प्रभावित थीं. वो एक तरह से गाँधी की पूजा करती थीं और ताउम्र उनकी सबसे बड़ी भक्त रहीं. प्रभावती ने गाँधी के साथ अपना बहुत समय साबरमती आश्रम में बिताया.
जयप्रकाश नारायण पर हाल ही में किताब ‘द ड्रीम ऑफ़ रिवोल्यूशन’ लिखने वाली सुजाता प्रसाद बताती हैं, “प्रभावती ने आश्रम के जीवन को उस तरह अपनाया जैसे मछली पानी को अपनाती है. वो गाँधी की तरफ बहुत आकृष्ट हुईं. गाँधी और कस्तूरबा दोनों उन्हें बहुत मानते थे. 1945 में जब कस्तूरबा आगा ख़ाँ पैलेस में नज़रबंद थीं और क़रीब-क़रीब लगने लगा कि वो इस दुनिया से जाने वाली हैं तो उन्होंने अपने पौत्र कदुम और प्रभावती को अपने पास बुलाया. प्रभावती उस समय भागलपुर जेल में बंद थीं. लेकिन अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें कस्तूरबा के पास जाने की अनुमति दे दी.”
प्रभावती और गाँधी की नज़दीकी
सुजाता प्रसाद आगे बताती हैं, “शुरू में प्रभावती और जेपी के विचार मेल नहीं खाते थे. उनके अनीश्वरवाद और मार्क्सवादी समाजवाद से प्रभावती की नहीं बनती थी. लेकिन फिर उनका जेपी पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने जेपी को गाँधी का मुरीद बना दिया.”
“गाँधी उनके लिए पितातुल्य थे. एक तरह से उनके मेंटर थे लेकिन साथ ही उनके सखा भी थे. उनके पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि दोनों के बीच कितने क़रीबी संबंध थे. वो आश्रम के काम करने में अपना घंटों समय बिताती थीं. उनमें कुछ काम ऐसे थे जिन्हें कोई करना पसंद नहीं करता था मसलन टॉयलेट को साफ़ करना. वो वहाँ पर संस्कृत और गुजराती सीखती थीं और जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर उन्होंने थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी भी सीखनी शुरू कर दी थी. उनको चर्खा चलाने, खाना बनाने और बर्तन धोने के लिए भी बढ़ावा दिया जाता था.”
प्रभावती का अकेलापन
गाँधी के कहने पर प्रभावती ने डायरी लिखना शुरू कर दिया था. वो रोज़ सुबह प्रार्थना के लिए चार बजे से पहले उठ जाती थीं. वो गाँधी के साथ टहलने जाती थीं और उनके पैरों में घी की मालिश किया करती थीं.
आश्रम के अपने दिनों को एक बार याद करते हुए उन्होंने कहा था, “एक बार साफ़ किए जाने वाले बर्तनों का ढेर लगा हुआ था. मैंने देखा कि गाँधी खुद बरतन धो रहे थे. मैं उनको हटाने के लिए उनकी तरफ़ दौड़ी लेकिन वो मुझ पर चिल्ला कर बोले तुम वो काम करो जो तुम्हें दिया गया है. तुम यहाँ क्यों आई हो? उस दिन गीता पढ़ने की ज़िम्मेदारी मेरी थी.”
आश्रम में रहते-रहते प्रभावती और गाँधी के संबंधों में मज़बूती आ गई. जयप्रकाश नारायण की लंबी अनुपस्थिति और लंबे समय तक उनके पत्र न लिखने की आदत ने उन्हें अकेला और उदास बना दिया था. उस समय गाँधी ने उनको उस स्थिति से उबारा और उनके जीवन में एक तरह से पिता की भूमिका निभाई.
प्रभावती ने जेपी से बगैर पूछे अपनाया ब्रह्मचर्य
नतीजा ये हुआ कि प्रभावती गाँधी की तरफ़ खिंचती चली गईं. जब वो 1929 में बंगाल और बर्मा की यात्रा के लिए निकले तो वो बहुत निराश हुईं.
गाँधी ने मार्च, 1929 में कलकत्ता से उन्हें झिड़कते हुए एक पत्र लिखा, “तुम्हारी इस तरह की घबराहट से मुझे तकलीफ़ पहुंची है. तुम्हें इससे छुटकारा पाना ही होगा. मैं तुमसे ठोस काम तभी करवा सकता हूँ जब तुम कहीं भी अपने बूते पर रहने के लिए सक्षम हो जाओ.”
एक और मौक़े पर गाँधी ने प्रभावती की वो ज़िद मानी कि वो जब भी कभी आश्रम से बाहर जाएं उनको वहां अकेला न छोड़ा जाए. गाँधी ने उनको जयप्रकाश नारायण के साथ अपने संबंधों पर काम करने और उनके राजनीतिक विचारों को समझने के लिए एक ईमानदार कोशिश करने के लिए भी कहा.
जयप्रकाश नारायण की अनुपस्थिति में प्रभावती ने अपने आप ही ब्रह्मचर्य का व्रत भी ले डाला. उस समय उनकी उम्र 22 साल की रही होगी.