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तब परिवार की जमीन बिक गई थी, टिकट तक के पैसे नहीं थे, लगातार मेहनत से कामयाबी पाई, धारणा बदली

दैनिक भास्कर

Mar 25, 2020, 05:30 PM IST

एजुकेशन डेस्क. बिहार के मधेपुरा जिले के बभनी गांव में रामाधार प्रसाद यादव के परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था। न आमदनी का कोई जरिया। थोड़ी बहुत जमीन थी। मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह बच्चों का पेट भरता था। रामाधार अपने बेटे तुलसी को पढ़ाना चाहते थे। स्कूल भेजना भी शुरू किया लेकिन, गरीबी के चलते तीसरी कक्षा के बाद तुलसी की पढ़ाई छूट गई। इसके बाद रामाधार का पढ़ाई से भरोसा उठ गया। वे समझने लगे कि पढ़ाई सिर्फ अमीरों के लिए है। लेकिन तुलसी को मलाल रहा कि वे पढ़ नहीं पाए। इसलिए अपने तीन बच्चों को वे पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे।

दादा ने छुड़ाई पढ़ाई
बेटा प्रदीप स्कूल जाना चाहता था, लेकिन दादा रामाधार उसे रोकते। वे कहते, अमीर लोग ही बड़े आदमी बन सकते हैं। वे प्रदीप को भैंस चराने भेज देते। थोड़ा बड़ा होने पर वह सरकारी स्कूल में जाने लगा। दादा को पता चला तो गुस्सा हो गए। उनके अनुसार, गरीबों के लिए पढ़ाई समय की बर्बादी है। प्रदीप घर से भैंस लेकर निकलता और उन्हें दोस्तों के हवाले कर खुद खेतों में पढ़ाई करने लगता। इसी तरह उसने अव्वल दर्जे से चौथी कक्षा पास की। दादा को पता चला तो उन्होंने स्कूल जाना बंद करवा दिया।

पढ़ाई के लिए बेची जमीन
एक शिक्षक को यह पता चला तो वे घर आ गए। उन्होंने घर के लोगों को बड़ी मुश्किल से प्रदीप को स्कूल भेजने के लिए राजी किया। प्रदीप को खोजने निकले तो वह खेतों में भैंस की पीठ पर बैठकर पढ़ाई करता मिला। यह देखकर उसके पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने उसी क्षण प्रदीप को आगे पढ़ाने का फैसला कर लिया। मास्टरजी के दिशा-निर्देशन में प्रदीप खूब मेहनत करने लगा। दसवीं में उसके पास किताबें नहीं थीं तो किसी से मांगकर काम चला लेता। फॉर्म भरने के समय पिता के पास पैसे नहीं थे। बीमारी के चलते घर में खाने को भी नहीं था। कोई मदद नहीं मिली तो तुलसी ने जमीन का आखिरी टुकड़ा भी बेच दिया।

आईआईटी में रैंक पाकर लिया बीएचयू में प्रवेश 
प्रदीप ने दसवीं पास कर ली, लेकिन आगे का रास्ता पता नहीं था। इसी दौरान उसे किसी ने “सुपर 30” के बारे में बताया। वह मुझसे मिलने ट्रेन से पटना पहुंचा, तो बिना टिकट के, क्योंकि टिकट खरीदने के भी पैसे नहीं थे। उसकी कहानी सुनकर मैंने उसे अपने बैच में शामिल कर लिया। यहां प्रदीप ने अपने सपने पूरे करने के लिए दिन-रात एक कर दिया। आत्मविश्वास ऐसा कि परीक्षा से महीनों पहले वह चयन को लेकर निश्चिंत हो चुका था। जब 2013 में आईआईटी का रिजल्ट आया तब वह अच्छी रैंक से पास हुआ और उसे आईआईटी, बीएचयू में प्रवेश मिला। अब प्रदीप एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहा है। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर गयी है। आईआईटी में पढ़ने की खुशी और उसके बाद एक अच्छी नौकरी के अलावा उसे इस बात की भी खुशी है कि वह दादाजी की धारणा बदलने में सफल रहा।
 

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